किसी ने कहा है... कोई हल ढूंढ़ लेते हैं मुसीबत जब भी आती है, मेरे परिवार का हर शख्स खुदा से कम नहीं है। आज विश्व परिवार दिवस है। परिवार यानी हिम्मत, हौसला और जीवन की आस, विश्वास और मकसद। सबकुछ परिवार के लिए और परिवार से ही। यूं तो इस भागदौड़ भरे जीवन में सभी अंधी दौड़ में भागे जा रहे हैं। ऐसे में लॉकडाउन ने फिर से परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम की ज्योत जलाई है।
खुशियां क्या होती हैं, ये लॉकडाउन में जाना
पारू के सिंगाही गांव निवासी सौरव एक आईटी प्रोफेशनल हैं। बाहर बाहर ही काम होता है। लॉकडाउन में अभी घर में ही रहते हैं। बताते हैं कि लॉकडाउन के दौरान एक बार फिर दिल बचपन में चला गया है। परिवार के सभी लोगों का साथ मिल रहा है। पहली बार एहसास हुआ है कि परिवार क्या है और इसकी खुशियों के क्या मायने हैं। डेढ़ महीने अब तक की जिंदगी के सबसे यादगार पल हैं। पिता का प्यार, मां का दुलार। भाभियों की हंसी-ठिठोली से लेकर छोटे भाई-बहनों का रूठना सबकुछ। काश ये पल कभी नहीं खत्म होता। जिंदगी यूं ही मजे से बीतती।
रिश्ता क्या होता है, अब एहसास हो रहा है
खबड़ा के बहुमूल्य कुमार ने बताया कि वे आठ वर्ष बाद लीची और आम के मौसम का मजा परिवार के साथ ले रहे हें। नोएडा में एक बहुप्रतिष्ठित कंपनी में काम करते हैं। लॉकडाउन के कारण परिवार के सदस्यों के बीच रहने का मौका मिला है। रिश्ता क्या होता है, इसका एहसास इन दिनों हुआ है।
परिवार का साथ नहीं है तो कुछ भी नहीं
डॉ. नवीन कुमार कहते हैं कि मनुष्य के जीवन में कामकाज का बोझ ऐसा होता कि पहले सोचते थे कि सबकुछ छोड़ कर परिवार के साथ वक्त बिताएं। लेकिन सामान्य दिनों में यह नहीं हो पाता। लॉकडाउन के कारण आज परिवार की कीमत और उसकी मौजूदगी और एहसास हो रहा है।



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परिवार के सदस्यों के साथ आईटी प्रोफेशनल सौरव।

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