(शैलेश कुमार) काेराेना महामारी के बीच चुनाव आयोग ने दिव्यांग और बुजुर्ग मतदाताओं के लिए बूथ के बदले घर पर बैलेट पेपर के जरिए मतदान की व्यवस्था की है। लेकिन, लोकतंत्र के महापर्व में भागीदारी का जज्बा ऐसा है कि 80 या 90 साल के कई मतदाताओं के साथ ही साै साल से अधिक उम्र के वाेटर भी मतदान के लिए बूथों पर जाएंगे।
वाेटिंग का उत्साह ऐसा है कि 108 साल उम्र की फूलपरी देवी इस चुनाव में भी मतदान कर चुकी हैं। दैनिक भास्कर लोकतंत्र के कुछ ऐसे ही प्रहरी से आपकाे रू-ब-रू करा रहा है, ताकि आप भी अधिक से अधिक उत्साह के साथ मतदान करें। बल्कि, किसी भी काम से पहले वाेट डालने मतदान केंद्रों पर पहुंचें।
शरीर में अब इतनी शक्ति नहीं कि बूथ तक जा पाऊं
70 साल पहले स्वतंत्रता सेनानी पति केदारनाथ सिंह के साथ पहली बार वोट डाली। अब तो धीरे-धीरे याददाश्त भी कमजोर हो चुकी है। मोतीझील आवास पर ही सरकारी बाबू बैलेट लेकर पहुंचे थे। पुत्र विनोद सिंह के सहयोग से वोट डाल चुकी हूं। हर किसी काे वाेट जरूर डालना चाहिए। -फूलपरी देवी (108 साल, मोतीझील)
करीब 70 साल पहले नौकरी के सिलसिले में असम में तैनाती थी। पहली बार वहीं वाेट डाला। फिर तीन चुनावों में वहीं वोट डालने का मौका मिला। तब से अब के चुनाव में बहुत अंतर आ गया है। तब देश के खातिर हम लोग वोट करते थे। अब जात-पात की हवा सुनते हैं। 28 अक्टूबर को प्रखंड कार्यालय के स्टाफ बैलेट लेकर घर आए थे। -चंद्रदेव सिंह, (102 साल, सिरसिया)
बेटा और पाेता विपिन ने भी घर पर ही बैलेट पेपर से वोट डालने के लिए कहा। लेकिन, हमने इनकार कर दिया। इस उम्र में भी मैं मतदान केंद्र पर जा कर ही वोट डालूंगा। शुरू के एक-दाे चुनावों में वोट नहीं डाले। उसके बाद से लगातार मतदान करते आ रहे हैं। -रुदल पंडित (96 वर्ष, कुड़िया)
पहले सभी मतदान के लिए बूथों तक नहीं जाते थे। बूथ भी बहुत दूर-दूर होता था। शहर में टाउन हॉल, बीबी कॉलेजिएट इन सभी जगहों पर मतदान केंद्र होता था। तकरीबन 40 साल से लगातार वोट गिराते आ रहा हूं। इस बार भी बूथ तक जा कर वोट डालूंगा। -अजीत चटर्जी (95 साल, कमरा मोहल्ला)
आजादी के बाद जो पहला चुनाव हुआ उसमें हम लोग वोट नहीं डाल पाए थे। बहुत कम लोग पहली बार वोट डालने गए थे। ठीक से मुझे साल याद नहीं है। देश में जब दूसरी बार चुनाव हुआ। उस समय से लगातार वोट गिरा रहे हैं। जब तक शरीर में ताकत हैं, वोट डालेंगे। - गोपाल सिंह (90 वर्ष, मोतीपुर)
पहले के चुनावों में महिला काे बूथ जाने की आजादी नहीं थी। परिवार के गार्जियन वोट डाल आते थे। 30-35 साल से लगातार मतदान का मौका मिल रहा है। पहले और अब के चुनाव में बड़ा अंतर आ गया है। पोते के साथ इस बार भी स्कूल वाले बूथ पर वोट डाले जाऊंगी। -सियावती देवी (90 साल, धूमनगर)
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