जिले में 7 नवंबर को होने वाले अंतिम चरण के चुनाव में 6 सीटें दांव पर हैं। चुनाव प्रचार भी चरम पर है। मतदाताओं को क्षेत्र के विकास के सपने फिर से दिखाए जा रहे हैं। हर कोई लुभावनी बातों और वादों से मतदाताओं को अपने पाले में करना चाह रहा है। कुछ प्रत्याशी तो जीतने के लिए जातिगत समीकरण बिठाने के साथ बाप-दादा के नाम और काम की दुहाई देने में भी पीछे नहीं हट रहे हैं।
इसी दावपेंच को देखते हुए अबतक जो स्थिति सामने आई है, उससे यह उम्मीद लगाई जा रही है कि 5 सीटों पर मुकाबला द्विपक्षीय होगा। एकमात्र जोकीहाट सीट पर त्रिकोणीय और राेमांचक मुकाबला देखने को मिल सकता है। हालांकि, सिकटी सीट पर भी सबकी नजर रहेगी क्योंकि यहां मैदान में उतरे बागी उम्मीदवारों ने दलीय प्रत्याशियों की नींद उड़ा रखी है।
इन खतरों का अहसास 6 सीटों पर खड़े प्रमुख प्रत्याशियों को भी हो गया है इसलिए वे अपनी किलेबंदी में भी कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। हर दिन जनसंपर्क के बाद चुनाव कार्यालयों में समीक्षा हो रही है। नफा-नुकसान पर तुरंत बातचीत कर उसके उपाय भी लगाए जा रहे हैं।
इस सबके बीच सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि एक भी ऐसा प्रत्याशी सामने नहीं आया जो जिले की सबसे बड़ी समस्या पलायन पर बात कर रहा हो। कोरोना काल में भी एक लाख मजदूर लौटकर आए थे। ये सोचकर कि अब अपने गांव-घर में ही काम-धंधा करेंगे। लौटकर वापस नहीं जाएंगे। लेकिन हुआ एकदम उल्टा। जिले में रोजगार के अभाव में अधिकांश मजदूर मजबूरी में फिर लौट गए। बीते दिनों बाहर के राज्यों से रोज 4-5 बसें आईं और बेरोजगारों को लेकर चली गईं।
फारबिसगंज में स्टार्च फैक्ट्री चालू नहीं, सिमराहा की मांस फैक्ट्री भी मुद्दा
जिले की दूसरी समस्या हर साल नेपाल से आने वाली बाढ़ है, जिसमें प्रतिवर्ष हजारों एकड़ फसल बर्बाद हो जाती है। लोगों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ता है। हालांकि, सिमराहा में मांस फैक्ट्री का उद्योग पिछले 5 वर्षों से चल रहा है, लेकिन चुनाव के समय में वह भी एक मुद्दा बन जाता है। वहीं, फारबिसगंज में स्टार्च फैक्ट्री अब तक चालू नहीं हो पाई है। स्टार्च फैक्ट्री से लोगों में रोजगार की उम्मीद जगी थी। साथ ही मक्का उपजाने वाले किसानों को भी फायदा पहुंचता, लेकिन फैक्ट्री चालू कराने की दिशा में कुछ नहीं हो पाया।
इन सभी समस्याओं पर प्रत्याशी चुप हैं। इसके पहले के चुनावों में भी इन मुद्दों पर प्रत्याशी खामोश ही नजर आए हैं। जबकि अररिया को जिला बने लगभग 30 साल हो गए हैं और इन 30 सालों में कोई भी नेता यहां स्थायी उद्योग स्थापित नहीं करा सका है। इसी के चलते इस बार के विधानसभा चुनाव में ज्यादातर लोगों को दिलचस्पी नहीं दिख रही है। चुनाव से जुड़े सवाल पर उनका एक ही जवाब है कि-हमारे जीवन में क्या बदलेगा? चुनाव तो सिर्फ नेताओं का है।
जानिए, जिले की 6 सीटों पर क्या चल रहा है-
कांग्रेस विधायक आबिदुर रहमान फिर से मैदान में हैं। उनके खिलाफ एनडीए से पूर्व जिप अध्यक्ष शगुफ्ता अजीम हैं जबकि भाजपा से बगावत कर पूर्व जिलाध्यक्ष चंद्रशेखर सिंह बब्बन लोजपा से मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने में जुटे हैं। आबिदुर के पिता मोईदुर रहमान और शगुफ्ता के ससुर अजीमुद्दीन मंत्री रह चुके थे। दोनों परिवार में वर्चस्व की जंग है।
इस बार भाजपा ने जेपी यादव जैसे नए चेहरे को उतारा है। ऐसे में पूर्व विधायक देवंती यादव, जनार्दन यादव और भाजपा नेत्री वीणा यादव की भी परीक्षा है। राजद ने निवर्तमान विधायक अनिल यादव को ही उतार दिया है। महागठबंधन में कुछ आंतरिक मतभेद है जिसके कारण राजद औऱ भाजपा के उम्मीदवार के बीच कांटे की टक्कर है।
पूर्व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री तस्लीमुद्दीन के दो पुत्र एक ही क्षेत्र से लड़ रहे हैं। इसका फायदा एनडीए को मिलने की संभावना है, लेकिन ये भी सच है कि यहां से अबतक भाजपा नहीं जीती है। राजद से पूर्व सांसद सरफराज आलम हैं, तो राजद के निवर्तमान विधायक शाहनवाज आलम एआईएमआईएम के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं।
अररिया और फारबिसगंज से एक-एक बार विधायक रह चुके जाकिर अनवर कांग्रेस के टिकट पर लड़ रहे हैं। वहीं भाजपा ने निवर्तमान विधायक विद्यासागर केसरी को उतारा है। श्रीराम सेना के उम्मीदवार प्रदीप देव और रन्तु मंडल चुनाव को दिलचस्प बनाने में जुटे हुए हैं। क्योंकि ये दोनों उम्मीदवार भाजपा के गढ़ में सेंधमारी कर सकते हैं।
विजय मंडल भाजपा से हैं और पांचवीं बार जीत की तैयारी में हैं। अंतिम समय में टिकट से वंचित होने पर जदयू छोड़ राजद के शत्रुघ्न मंडल हैं। शत्रुघ्न के पिता मुरलीधर मंडल 2005 में निर्दलीय जीते थे। एनडीए और महागठबंधन दोनों उम्मीदवार का अपना वोट बैंक है। राजद से बगावत कर निर्दलीय लड़ रहे कमरुज्जमा खतरा बन सकते हैं।
इस सीट से जदयू ने निवर्तमान विधायक अचंभित ऋषिदेव को ही मैदान में उतारा है। राजद ने शिक्षक रहे युवा अविनाश मंगलम को प्रत्याशी बनाया है। भाजपा से दो बार विधायक चुने गए परमानंद ऋषिदेव लोजपा के टिकट पर लड़ रहे हैं। लिहाजा, एनडीए के वोटरों में असमंजस है। यहां भाजपा-राजद के बीच सीधी लड़ाई की उम्मीद है।
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