गया (अनिरुद्ध शर्मा). सुबह के सवा पांच बजे हैं। फल्गु नदी के बालू पर देवघाट के सामने और दोनों तरफ सैकड़ों समूहों में श्रद्धालु बैठे हैं। उनके सामने पीतल की थालियों और पत्तों में जौ के आटे से बने लड्डू रखे हैं। इन्हें पिंड कहा जाता है। पंडित मंत्रोच्चार करा रहे हैं। इन्हीं समूहों के बीच पंडित दीपक तिवारी भी हैं। वे नेपाल से आए जजमानों से पांच समूहों में पिंडदान करा ही रहे थे कि अगले जजमान का फोन आ गया कि वे विष्णुपद मंदिर पहुंच गए हैं। पूजा खत्म होते ही सभी ने 21-21 सौ रुपए दक्षिणा में दिए। तिवारी बताते हैं, साल में यही 17 दिन तो हमारे आमदनी के हैं। अगला सवाल था- तो क्या 4-5 लाख रुपए की आय हो जाती होगी? मुस्कुराते हुए तिवारी ने कहा-इससे भी ज्यादा।
पितृ पक्ष में करीब दस लाख लोगों के गया आने की संभावना है और तीन हजार से अधिक पंडे करीब 2 लाख पिंडदान करवाएंगे। कई परिवार तीन दिन में गया की सभी 45 वेदियों में पिंडदान कर रहे हैं। वयोवृद्ध पंडा कन्हैयालाल मिश्रा कहते हैं कि जजमान 100 रुपए, 251 रुपए से लेकर 51 हजार और एक लाख रुपए तक दान करते हैैं। इन 17 दिनों में पंडों को 40-45 करोड़ रुपए की राशि केवल दान से मिल जाएगी।
मध्यप्रदेश के सागर सहित कई जिलों के जजमानों के पंडा संगम गुपुत कहते हैं कि तीन-चार महीने पहले से ही पंडे जजमानों के घर जाकर मिलते हैं और उन्हें पितृ पक्ष में पितरों के लिए पिंडदान के लिए गया आने के लिए प्रेरित करते हैं। पंडे जजमानों को बताते हैं कि जिनके पुरखे, पिता-दादा पहले भी आ चुके हैं, उन्हें गया में रहने और खाने-पीने पर कुछ भी खर्च नहीं करना पड़ता है। पंडे उनके रहने और खान-पान का इंतजाम अपने घर या गेस्ट हाउस में करते हैं। पंडों के इन प्रयासों से यहां आने वालों की संख्या बढ़ रही है। पंडा सागर लाल कहते हैं कि अभी 50-60 हजार यात्री रोज आ रहे हैं और 28 सितंबर पितृ अमावस्या पर करीब एक लाख लोग पहुंचेंगे।
45 वेदियों पर पिंडदान की परंपरा है
वायुपुराण, गरुड़ पुराण जैसे ग्रंथों में गया का महत्व बताया गया है। कहा जाता है कि तर्पण के लिए प्राचीन समय में यहां 360 वेदियां थीं। लेेकिन अब 45 वेदियों पर पिंडदान होता है। इनमें पांच वेदियां प्रेतशिला पर हैं। जहां पहुंचने के लिए 400 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। अधिकतर लोग 10-15 सीढ़ियां चढ़कर सांकेतिक रूप से वहीं पिंडदान कर देते हैं।
17 दिन तक का श्राद्ध भी करते हैं जजमान
गया में पितृपक्ष में जजमान एक, तीन, पांच और 17 दिन तक का श्राद्ध करते हैं। नेपाल, बांग्लादेश और दुनियाभर में बसे हिंदु पिंडदान करने पहुंचते हैं। वायु पुराण के अनुसार, यहां अकाल मृत्यु वालों के पिंडदान का विशेष महत्व है।
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