जिले के सबसे बड़े आईएसओ से मान्यता प्राप्त सदर अस्पताल में पर्याप्त संख्या में ड्रेसर के नहींं रहने से मरीजों को मरहम-पट्टी कराने में भी परेशानी होती है। कभी-कभी इन्हीं परेशानियों की वजह से मरीज प्राइवेट क्लिनिक की ओर रुख करते हैं। इमरजेंसी का ड्रेसिंग रूम चतुर्थवर्गीय कर्मियों के रहम-ओ-करम पर संचालित है। यहां पर अधिकांश वार्ड ब्वॉय एवं सफाईकर्मी की सहायता से मरीजों का मरहम-पट्टी कराई जाती है। चतुर्थवर्गीय कर्मियों, वार्ड ब्वॉय एवं सफाई कर्मियों के नहींं रहने पर चिकित्सक को खुद ही मरहम-पट्टी के साथ स्टिच तक लगाना पड़ता है। इतने बड़े सदर अस्पताल में एक संविदा तथा एक रेगुलर दो ड्रेसर के बल पर मरीजों की मरहम पट्टी की जाती है। मैन पावर की कमी की वजह से मरीजों को बेहतर चिकित्सा का लाभ नहींं मिल पाता है।

मैनेजर बोले- कम से कम 12 ड्रेसर चाहिए

सदर अस्पताल के मैनेजर मनोज कुमार ने बताया कि ड्रेसर की कमी के कारण परेशानियां जरूर होती है, लेकिन उन परेशानियों को दूर करने का प्रयास किया जाता है। वैसे ड्रेसर की बहाली वर्षों में नहींं हुई है। यदि दर्जन भर के आसपास ड्रेसर की नियुक्ति हो जाए तो हंगामा में भी कमी आएगी और मरीजों को बेहतर सुविधा मिलेगी। इमरजेंसी वार्ड में कम से कम चार, ओटी में एक, ओपीडी में दो ,सर्जिकल में दो सहित अन्य वार्डों में ड्रेसर की आवश्यकता है। दूसरे द्वारा मरहम पट्टी करने के मामले में मैनेजर ने कहा कि सहायता सिर्फ ली जाती है। ड्रेसर के जरिए पट्टी बांधने का काम किया जाता है।

चिकित्सकों को भी ड्रेसर के नहींं रहने पर करनी पड़ती है खुद से ड्रेसिंग

प्रबंधन को दूसरों की जिंदगी से खेलने की मजबूरी: सदर अस्पताल के हजारों मरीजों के बीच सिर्फ दो ड्रेसर के बदौलत ड्रेसिंग होता है। अस्पताल में ओपीडी व इमरजेंसी को मिलाकर 4 से पाच हजार मरीज आते है। यानी ढाई हजार पर एक मरीज।

इमरजेंसी में तीन शिफ्ट में होता है काम, एक के भरोसे 24 घंटे

सदर अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में ड्रेसर के नहींं रहने पर कई बार चिकित्सक ही ड्रेसिंग करते देखे गए हैं। ऐसे में 3 शिफ्टों में ड्रेस नहींं रहने के कारण चतुर्थ वर्गीय कर्मी के कंधों पर मरहम-पट्टी से लेकर अन्य सभी तरह की जिम्मेवारी होती है। जो इस काम में दक्ष तक नहींं होते।सदर अस्पताल में ड्रेसर की कमी से अस्पताल प्रबंधन भी परेशान है। इमरजेंसी में एक ड्रेसर की ड्यूटी रहती है हालांकि, वही ड्रेसर ओटी तथा ओपीडी में भी देखरेख करता है। यदि मरीज कोई इमरजेंसी में तुरंत इलाज करना पड़ेे तो इसके लिए उसे वेट करना पड़ता है। ड्रेसर को दूसरे वार्ड से बुलाना पड़ता है। नहींंं तो इलाज वहां खड़े वार्ड ब्वॉय व सफाई कर्मी से कराना पड़ता है।

दो ड्रेसर के भरोसे अस्पताल, एक ओपीडी में, तो दूसरा कभी ओटी या इमरजेंसी में

सदर अस्पताल के ओपीडी में एक ड्रेसर काम करते हैं। जबकि,एक की ड्यूटी कभी ओटी में तो कभी इमरजेंसी वार्ड में लगती है। एक से ज्यादा मरीज को यदि मरहम-पट्टी करनी होती है तो ऐसे काम में वार्ड ब्वॉय व सफाई कर्मी लग जाते हैं। जानकारी के अभाव एवं बिना ट्रेनिंग लिए वार्ड ब्वॉय एवं सफाई कर्मी की सहायता से मरीजों का इलाज किया जाता है। कई बार झगड़ा भी हो जाता है जिससे परिस्थितियां टेंशन खड़ा कर देती है। अस्पताल प्रबंधन कहता है कि दो ड्रेसर हमारे पास मौजूद है। एक की ड्यूटी ओटी में और दूसरा इमरजेंसी में। कई बार ड्रेसर के अलावा बाहरी व्यक्ति भी अस्पताल में ड्रेसिंग करते देखे जा सकते हैं। इसको लेकर हंगामा भी कई बार हो चुका है। बावजूद ड्रेसर की बहाली अब तक नहींं हो पाई है।

500 मरीज आते हैं इमरजेंसी में: आंकड़े बताते हैं कि प्रति महीने सदर अस्पताल में कम से कम 500 से 6 सौ से ज्यादा एक्सीडेंटल मरीज इमरजेंसी में इलाज कराने आते हैं। कुछ का इलाज सदर अस्पताल के ओपीडी में भी होता है।



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Ara News - sadar hospital ward boy and scavengers rely on 2 dressers instead of 12 dressing patients

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