डीजीपी के आदेश पर कागजी काम के लिए प्रतिनियुक्त किए गए थे थाना लेखक
गांवों में बिक रही शराब, अधिकारियों तक नहीं मिल रही सूचना
शराबबंदी को सफल बनाने में एसपी से लेकर वरीय अधिकारी लगे हुए हैं, लेकिन निचलेे स्तर से उन्हें सहयोग प्राप्त नहींं हो रहा। अधिकांश गांव में शराब की बोतलें मिल रही हैं। शादी-विवाह, पार्टी-फंक्शन में गोलियां शराब पीने के बाद चल रही है। मारपीट हो रही है। हत्या तक हुई है। कुछ दिनों पहले चरपोखरी के बाल बांध की घटना ने सब को हिला कर रख दिया था। पार्टी में शादी के बाद हत्या, नारायणपुर में प्रधानाध्यापिका की बेटे की शराब पीकर हत्या, सोनार हत्याकांड सहित कई हत्या एवं गोलीबारी से जुड़े मामले हैं ,जिनमें शराब किसी न किसी रूप में शामिल है।दूसरे लोगों से सूचनाएं पुलिस को प्राप्त हो रही है लेकिन ना तो चौकीदार और ना ही एसपीओ के माध्यम से पूरी सूचना पहुंच पा रही है। हालांकि कुछ चौकीदार व एसपीओ अपनी ड्यूटी एक ढंग से नहीं आते हैं।
अपने चहेतों से इसमें काम लेते हैं थानेदार
थाना लेखकों की जगह थानेदार अपने चहतों से इस काम को पूरा करवाते हैं। कई थानों में ऐसा देखने को मिला है।
क्या है चौकीदार का काम, कुछ कई थानों में कर रहे लेखक का काम
चौकीदार शब्द उर्दू के शब्द चौकी से बना है और दार का अर्थ होता है रखवाला। पुराने जमाने में हर गांव की सीमा के चार कोनों पर एक चौकी होती थी। जहां के जरिए एक या उससे अधिक जिम्मेवार व्यक्ति के द्वारा पूरे गांव पर नजर रखी जाती थी। जिससे गांव को घुसपैठियों, चोरों और डकैतों से बचाया जा सके। बाद में समय परिवर्तित हुआ और चौकीदार का काम गांव के अंदर गलत ना हो, गलत करने वालों के बारे में जानकारी अधिकारियों तक पहुंचाना होने लगा। कानून-व्यवस्था में उनकी भूमिका मानी जाती है। ये पुलिस को सूचना देने का काम करते हैं, साथ ही पहरेदारी की भी भी जिम्मेवारी होती है। गांवों के सिस्टम में उनकी अपनी एक खास जगह है। उन्हें गांवों की पुलिस सिस्टम के रूप में मान्यता दी जाती रही है। कस्बों के पुलिस स्टेशन छोटे गांवों में चौकीदारों की नियुक्ति करते हैं। आमतौर पर गांवों में होने वाले किसी अपराध की प्रथम सूचना उन्हीं के जरिए पुलिस तक पहुंचती है। इस सिस्टम के बाद भी भोजपुर जिला में वर्तमान परिवेश में ऐसा संभव नहीं हो रहा है।
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