सुपर 30 धीरे-धीरे चर्चा में आने लगा था और 2005 में लंदन से मिशेल क्रिस्टोफर ने मुझसे संपर्क किया। दरअसल वे सुपर 30 पर डिस्कवरी चैनल के लिए एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाना चाहते थे। क्रिस्टोफर का आईडिया मुझे बहुत ही अच्छा लगा और मैंने हां कर दी। शूटिंग शुरू हो गई और सुपर 30 के एंट्रेंस टेस्ट में आए बच्चों से क्रिस्टोफर ने बातचीत शुरू कर दी। क्रिस्टोफर की नजर एक सीधे-साधे दिखने वाले ग्रामीण लड़के आलोक कुमार पर गई।
क्रिस्टोफर ने सबसे पहले आलोक के घर जाने का फैसला किया। कैमरे में कैद दृश्य में आलोक के घर में खाने के लिए अनाज के नाम पर बस थोड़ा सा चावल ही था, चूल्हे के धुएं में पकता खाना और घर की बदहाली थी दृश्यों में। आलोक के पिताजी ने बड़ी उदासी के साथ बताया कि कभी बाढ़ तो कभी सूखे के चलते ठीक से खेती नहीं हो पाती है। उनके पास बस थोड़ी सी ही जमीन और एक भैंस है, जो कि उनके परिवार की जीविका का साधन है।
आलोक ने बड़ी गरीबी में अपने ही गांव के सरकारी स्कूल से पढ़ाई की थी। कुछ भी पैसा नहीं रहने के बावजूद आलोक की मां उमा देवी आलोक को पढ़ाना चाहती थीं। दसवीं पास करने के बाद आलोक को सुपर 30 का पता चला और वह मेरे पास टेस्ट देने आया था। आलोक ने आईआईटी की प्रवेश परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी। शुरू में तो वह काफी घबरा गया, क्योंकि इंग्लिश मीडियम से पढ़ने में उसे काफी दिक्कत हो रही थी। वह वापस जाना चाह रहा था, लेकिन मैंने उसे लगातार संघर्ष करने के लिए कहा। आलोक ने रात-दिन एक कर दिया। मैंने उसे हर संभव सहयोग दिया।
लगभग चार-पांच महीने के बाद फिर लंदन से मिशेल क्रिस्टोफर का आना हुआ। उन्होंने आलोक से मुलाकात की और उसके गांव भी गए। फिल्म को देखने के बाद मुझे पता चला कि इस बार आलोक की मां उमा देवी से क्रिस्टोफर की पहली मुलाकात हुई। वह गोबर के उपले थोप रही थीं। वहीं शूटिंग शुरू हो गई, उसी वक्त आसमान में एक हवाई जहाज उड़ता हुआ जाता है, तब आलोक की मां कहती हैं कि उन्हें पूरा विश्वास है कि एक दिन जरूर ऐसा आएगा जब आलोक इसी जहाज से उड़ेगा।
आलोक सुपर 30 के बच्चों के साथ कदम से कदम मिलाकर कठोर परिश्रम कर रहा था। 2007 में एक दिन आ ही गया, जब आईआईटी प्रवेश परीक्षा का रिजल्ट घोषित हुआ। उस दिन आलोक थोड़ा उदास था। आईआईटी की मेरिट लिस्ट में नाम तो था, लेकिन अच्छी रैंक न होने से आईआईटी में दाखिले की कोई उम्मीद नहीं थी। उसके बाद आलोक ने मुझसे संपर्क तोड़ लिया, न कोई फोन और न कोई ईमेल।
आज से लगभग 6 साल पहले एक लड़के ने आकर मुझसे कहा कि सर, आपने मुझे पहचाना? मैं हैरान था। वह आलोक था और अब वह काफी संपन्न नजर आ रहा था। दरअसल आईआईटी में एडमिशन नहीं होने के बावजूद वह टूटा नहीं था, बल्कि उसेे एनआईटी वारंगल में एडमिशन मिला। वहां उसने काफी मेहनत की। उसने अपना गोल्ड मेडल भी मुझे दिखाया और उसकी बड़ी नौकरी भी लग गई थी। आलोक ने कहा कि उसने तय किया था कि वह मेहनत को बेकार नहीं जाने देगा और सफल होकर ही गुरु से मिलेगा। अब आलोक संवर गया था। मैं बहुत खुश हुआ और मुझे आलोक के जीवन से दूसरे स्टूडेंट्स के लिए भी यह सार मिला कि एक असफलता से निराश होने की जगह, जो मौका मिला है उसके साथ बढ़ते हुए मेहनत की जाए, तो आगे की राहें नए सिरे से आपको मौका देती हैं। आलोक ने सफलता की उड़ान के साथ हवाई जहाज में उड़ान भरके अपनी मां का सपना भी पूरा किया, क्योंकि उसकी मां ने कहा था कि एक दिन जरूर ऐसा आएगा जब आलोक इसी जहाज से उड़ेगा।
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