हाईकोर्ट ने पटना नगर निगम की वित्तीय स्वायत्तता पर सवालिया निशान लगाते हुए नगर आयुक्त से पूछा कि पिछले दो वित्तीय वर्ष में राज्य सरकार से कितना फंड मिला है और उसमें कितना, कहां-कहां खर्च हुआ? शुक्रवार को चीफ जस्टिस संजय करोल व न्यायमूर्ति एस. कुमार की खण्डपीठ ने एडवोकेट मयूरी की जनहित याचिका को सुनते हुए यह आदेश दिया।
कोर्ट ने सरकार व निगम की कार्यशैली पर टिप्पणी करते हुए कहा कि दोनों, संविधान व नगरपालिका कानून को फिर से पढ़कर जल्द पटनावासियों को सभी नागरिक सुविधाएं देने के लिए साथ काम करें। मामला, पटना बाईपास के दक्षिणी सिरे पर बनी कॉलोनियों की बदहाल सड़कों व सीवेज की समस्या का है। इसको लेकर कोर्ट में दायर याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई हुई।
याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि पटना नगर निगम, राज्य सरकार के प्राधिकार के तौर पर काम कर रही है। निगम को 74वें संविधान संशोधन से मिली वित्तीय स्वायत्तता की मानो जानकारी तक नहीं है। राज्य वित्तीय आयोग की अनुशंसा पर नगर निकायों को राजस्व में हिस्सा मिलता है। कई मामलों में खुद राजस्व उगाही की शक्ति है। इसके बावजूद निगम, राज्य सरकार पर ही निर्भर है।
सभी बुनियादी सुविधाएं कैसे देगा निगम, फौरन तय करे
हाईकोर्ट ने नगर आयुक्त को निर्देश दिया कि वे फौरन मेयर के साथ बैठक करके यह तय करें कि निगम, नगरपालिका कानून के तहत पटनावासियों को बुनियादी नागरिक सुविधाएं कैसे देने वाला है? इस बारे में निगम को जवाबी हलफनामा दायर करना होगा। अगली सुनवाई 22 दिसंबर को होगी।
पटना के नगर आयुक्त से पूछा-पिछले दो वित्तीय वर्ष में सरकार से कितना रुपया मिला, कहां-कहां खर्च हुआ ?
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की-’ऐसा लगता है कि निगम को वित्तीय तौर पर ऐसे जकड़ कर रख दिया गया है मानो वह भुखमरी के कगार पर आ गया हो।’ कोर्ट ने हैरानी जताई कि संविधान से मिली सारी वित्तीय शक्तियां, बिहार नगरपालिका कानून में रहते हुए भी न तो राज्य सरकार और न ही निगम के मेयर व पार्षदों का इस ओर कोई ध्यान है।
कोर्ट ने पूछा-’सूबे के नागरिकों की बदहाली का बदस्तूर जारी रहना क्या सरकार, मेयर व पार्षदों, सभी को सूट करता है? और या कोर्ट यह माने कि निगम के मेयर, पार्षदों ने इसलिए अब तक अपनी शक्तियों के लिए आवाज नहीं उठायी, क्योंकि वे खुद अपने अधिकार व शक्तियों का इस्तेमाल करने में फेल हो गए हैं या इन्हें अपनी संवैधानिक शक्तियों की जानकारी ही नहीं है?’ कोर्ट का यह भी कहना था-’हम यह मान लें कि ये सभी लोग जानबूझकर यह मान बैठे हैं कि पटना के लोगों की बदहाली अंतहीन है?’
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