रमज़ान के पाक महीने के आखिरी अशरे की शुरूआत हो गई है। तीसरे दस दिन को जहन्नम यानी नरक से आजादी का अशरा कहा जाता है। जिस प्रकार रमज़ान के पूरे महीने का अन्य महीनों में एक विशेष स्थान है। उसी प्रकार से रमज़ान के अंतिम दस दिनों का पूरे महीने में एक विशेष स्थान है। ये बातें इस्लामिक स्कॉलर मौलाना मुहम्मद मुसव्विर आलम नदवी ने कही। उन्होंने कहा इस्लाम के पांच बुनियादी स्तंभों में एक रमज़ान का रोज़ा भी आता है। पने आखिर वर्ष में पैगम्बर साहब ने आपने बीस दिनों का ऐतिकाफ किया। रमज़ान के आखरी अशरे की कोई एक रात शब-ए-क़द्र की होती है।
ऐतिकाफ एक प्रकार की इबादत है। पुरुष मस्जिदों में और महिलाऐं घर के किसी कोने में बैठकर मौन व्रत के साथ करती हैं। इसमें अंतरात्मा की शुद्धि तथा गांव, समाज, शहर और देश वासियों की अभ्युन्नती एवं कल्याण के लिये अल्लाह से दुआएं की जाती हैं। प्रत्येक क्षण को अल्लाह के इबादत और याद में लीन होकर गुजा़रने की कोशिश होती है।
आखिरी अशरा और शब ए कद्र
रमज़ान के अंतिम दस दिनों का सबसे महत्वपूर्ण गुण और विशेषता यह है कि इसमें एक रात ऐसी है जो एक हज़ार महीनों से बेहतर है। इसी रात को क़ुरान जैसा अमूल्य उपहार मानव जाती को खुदा ने दिया है। यही वह रात है जिसकी महिमा वर्णन के लिए पवित्र कुरान में कद्र नामक अलग से एक संपूर्ण सूरा का अवतरण हुआ।
पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फर्माया है कि रमज़ान के अंतिम दस दिनों की ताक
की रात में शब-ए-क़द्र की तलाश करें।
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